आध्यात्मिक ज्ञान मे आज आप देखे कि हमारा पुरुषार्थ बढा है या भाग्य इस लेख को पूरा पढनेके लिए नीचेदीगई लिक पर क्लिककरें-डा०-दिनेशकुमार शर्मा चीफ एडीटर एम.बी.न्यूज-24💐💐💐💐💐💐💐💐💐

💐*आध्यात्मिकज्ञान मे आज आप देखे-💐
💐(((( पुरुषार्थ बड़ा या भाग्य! ))))*💐
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एक बार दो राज्यों के बीच युद्ध की तैयारियां चल रही थीं। दोनों राज्यों के शासक एक प्रसिद्ध संत के भक्त थे।
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तथा वे दोनोंअपनी-अपनी विजय का आशीर्वाद मांगने के लिए अलग-अलग समय पर उनके पास पहुंचे।

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पहले शासक को आशीर्वाद देते हुए संत बोले, ‘तुम्हारी विजय निश्चित है।’
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दूसरे शासक को उन्होंने कहा, ‘तुम्हारी विजय संदिग्ध है।’
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दूसरा शासक संत की यह बात सुनकर चला आया, किंतु उसने हार नहीं मानी और अपने सेनापति से कहा…
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‘हमें मेहनत और पुरुषार्थ पर विश्वास करना चाहिए। इसलिए हमें जोर-शोर से तैयारी करनी होगी।
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दिन-रात एक करके युद्ध की सारी बारीकियां हमे सीखनी होंगी। हमेअपनी जान तक को झोंकने के लिए तैयार रहना होगा।’
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इधर पहले शासक की प्रसन्नता का ठिकाना न था। उसने अपनी विजय निश्चित जान अपना सारा ध्यान आमोद-प्रमोद व नृत्य-संगीत में लगा दिया।
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उसके सैनिक भी रंगरँगेलियां मनाने में लग गए। निश्चित दिन आने पर युद्ध आरंभ हो गया।
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जिस शासक को विजय का आशीर्वाद था, उसे कोई चिंता ही न थी। उसके सैनिकों ने भी युद्ध का अभ्यास नहीं किया था।
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दूसरी ओर जिस शासक की विजय संदिग्ध बताई गई थी, उसने व उसके सैनिकों ने दिन-रात एक कर युद्ध की अनेक बारीकियां जान ली थीं।
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उन्होंने युद्ध में इन्हीं बारीकियों का प्रयोग किया और कुछ ही देर बाद पहले शासक की सेना को परास्त कर दिया।
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अपनी हार को देखकर पहला शासक बौखला गया और संत के पास जाकर बोला, ‘महाराज, आपकी वाणी में कोई दम नहीं है। आप गलत भविष्यवाणी करते हैं।’
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उसकी बात सुनकर संत मुस्कराते हुए बोले, ‘पुत्र, इतना बौखलाने की आवश्यकता नहीं है।

तुम्हारी विजय निश्चित थी, किंतु उसके लिए मेहनत और पुरुषार्थ भी तो जरूरी था।
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भाग्य भी हमेशा कर्मरत और पुरुषार्थी मनुष्यों का साथ देता है और उसने दिया भी है, तभी तो वह शासक जीत गया जिसकी पराजय निश्चित थी।’
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संत की बात सुनकर पराजित शासक लज्जित हो गया और संत से क्षमा मांगकर वापस चला आया।
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))

यह छोटी सी कहानी आप लोगों को कैसी लगी अच्छी लगी हो तो लाइक कमेंट कीजिएगा।
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