अद्भुत भक्ति: जब श्रीहरि विष्णु ने महादेव को अर्पित कर दिया अपना नेत्र-
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।💐। सुदर्शन चक्र प्राप्ति की दिव्य कथा ।।💐
एक समय जब दैत्यों का अत्याचार तीनों लोकों में बढ़ गया और धर्म संकट में पड़ गया, तब सभी देवता व्याकुल होकर भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे।

🙏 विष्णु जी का संकल्प और कठोर तप
देवताओं की पीड़ा देखकर श्रीहरि ने कहा कि इस संकट का निवारण केवल देवाधिदेव महादेव ही कर सकते हैं। भगवान विष्णु कैलाश पर्वत पर गए और उन्होंने शिवजी की घोर तपस्या आरंभ की। वे नित्य एक हजार नामों से महादेव की स्तुति करते और प्रत्येक नाम के साथ एक श्वेत कमल अर्पित करते। यह क्रम एक हजार दिव्य वर्षों तक चलता रहा।
🌸 महादेव की परीक्षा और श्रीहरि का त्याग
एक दिन भगवान शिव ने श्रीहरि की भक्ति की परीक्षा लेनी चाही। विष्णु जी जब एक हजार कमल लेकर पूजा करने बैठे, तो महादेव ने अपनी माया से एक कमल छिपा दिया।

जब एक पुष्प कम पड़ा, तो ‘कमलनयन’ भगवान विष्णु ने अपनी दृढ़ता का परिचय दिया। उन्होंने सोचा कि मेरे नेत्र भी तो कमल के समान ही हैं। ऐसा विचार कर उन्होंने तुरंत अपना एक नेत्र निकालकर शिवजी के चरणों में अर्पित कर दिया।
✨ सुदर्शन चक्र की प्राप्ति
श्रीहरि का यह अद्भुत और अकल्पनीय त्याग देखकर महादेव तत्काल प्रकट हो गए। वे बोले, “हे विष्णु! तुम्हारे इस त्याग से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम्हारे लिए मेरे पास कुछ भी अदेय नहीं है।”

भगवान विष्णु ने उनसे दैत्यों के संहार के लिए शक्ति मांगी। तब प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपना अमोघ अस्त्र ‘सुदर्शन चक्र’ प्रदान किया। उसी दिव्य चक्र से श्रीहरि ने दैत्यों का संहार कर धर्म की पुनः स्थापना की।
यह कथा सिद्ध करती है कि हरि और हर (विष्णु और शिव) एक दूसरे के परम भक्त और पूरक हैं।
❀༺꧁|| 🙏 जय श्री हरि || 🙏꧂༻❀

